बुधवार, 10 जून 2015

रात बिरत रा आखर- ३ (आज ज्ञान :D )

बढती उम्र के साथ-साथ दुनिया को समझने की लालसा भी बढती जाती और दुनिया समझने के साथ-साथ नींदें भी उड़ती जाती है। सबकुछ छूटने लगता है बातें, खेल, सामाजिक कार्य दोस्त और होता है तो बस काम, काम और काम।
सब से ज्यादा अगर कुछ छूटने का मलाल होता है तो वो है शाम, संगीत, हवा का शोर, पत्ते, पानी और लौटते पंछी। सुबह देर से उठके निकल जाओ और देर रात लौटो। सुबहें खो जाती है और शामें कैद हो जाती है।
छूटने के बाद हमें चीज़ों का मोल समझ में आता है, कितनी अनमोल है ये चीज़ें। उदासियों का रामबाण इलाज, पहाड़ी पर ढलती शाम अपने साथ हर अवसाद को उड़ा ले जाती है और उसके बाद गहरी नींद, अगली सुबह से फिर वहीं कहानी।
किसी भी काम को करना चाहते है ना तो बस उसकी चाळ पकड़ के पीछे पड़ जाईये, शुरूआत में यह आपको चिड़चिड़ा बना देगा, लेकिन अगर इस चिड़चिड़ेपन पर काबू पा लिया तो फिर आपकी नैया पार है। और सिर्फ पार ही नहीं करोगे बल्कि भवसागर में गीत गाते, गुनगुनाते सफ़र करोगे।
तो फिर लगे रहिए नाव को पार लगाने की जद्दोजहद में और हां गुनगुनाते हूए वरना चिड़िचिड़े हो गये ना तो नाव में छेद हो जायेगा।
दो दिन के बाद तारे अशोबा के चंगुल से निकले है तो अब मैं देखता हूं तारे......

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